पिछले साल वेस्ट
यूपी में हुए सांप्रदायिक दंगों से अगर मेरठ जिला प्रशासन ने सीख ली होती तो शायद
शानिवार को हुए मजहबी बवाल को रोका जा सकता था। मुहल्ला तीरगरान में कई दिनों से
प्याउ को लेकर चल रहे दो पक्षों के बीच तनाव की जानकारी प्रशासन को थी। इसके
बावजूद जिला प्रशासन विवाद की सूचना मिलने पर उसके परिणाम का आकलन करने में असफल
रहा। सूचना के बावजूद पुलिस का मौके पर देर से पहुंचना भी बलवे का बड़ा कारण रहा।
मौके पर थोड़ी संख्या में पहुंची पुलिस खुद अपना बचाव करने के लिए गलियों में छिपती
दिखी। इससे दंगाइयों का मनोबल बढ़ गया और वे उत्पात मचाते रहे। सवाल यह भी खड़ा हो
रहा है कि इस घटना के पीछे सोची समझी साजिश तो नहीं थी?
थाना कोतवाली के मुहल्ला तीरगरान स्थित धार्मिक स्थल के पास कुंए का विवाद वर्षों पुराना है। कुएं को लेकर दो पक्ष कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। उनमें समझौते भी हुए। लेकिन हल नहीं निकल पाया। चार दिन पहले भी यहां विवाद हुआ था। इसकी जानकारी थाना पुलिस को भी थी। फिर शानिवार को जब यहां एक पक्ष के लोगों ने प्याउ बनाने का काम शुरू करना चाहा तो दूसरे पक्ष ने इसकी सूचना अधिकारियों को दी। लेकिन पुलिस अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे। थोड़ी प्रतीक्षा के बाद दूसरे पक्ष ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। कुछ देर के लिए लगा कि मामला शांत हो गया है। लेकिन थोड़ी देर बाद ही दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। जमकर पथराव व फायरिंग हुई। दर्जनों लोग घायल हो गए। चार को गोली लगी जिसमें से एक की हालत नाजुक बनी हुई है। बलवाईयों ने दुकानें लूटीं, वाहनों को आग के हवाले किया और थोड़ी संख्या में मौके पर पहुंची पुलिस लाचार देखती रही। बाद में आईजी आलोक शर्मा भारी पुलिस बल लेकर पहुंचे और फिर पुलिस अपने रंग में नजर आई।
शानिवार को प्याउ को लेकर हुए विवाद के बाद दोनो पक्ष वापस चले गए थे। इस घटना के कुछ देर बाद दोनों पक्ष आमने-सामने आए और पथराव व फायरिंग हुई। इससे ऐसा आभास मिलता है कि उन्हें किसी के द्वारा उकसाया या भड़काया गया था। पुलिस के सूत्र इसके पीछे किसी सुनियोजित साजिश की संभावना से भी इनकार नहीं कर रहे हैं। घटना के बाद जिस तरह बड़ी संख्या में दोनों पक्षों की ओर से फायरिंग की गई है, उससे भी आखिर यह सवाल खड़ा हो रहा है कि इतनी बड़ संख्या में अवैध हथियार लोगों के पास कहां से आए। हाल ही में क्षेत्र में चुनाव हुए हैं। ऐसे में क्या पुलिस को इन हथियारों की कोई जानकारी नहीं थी। खुफिया विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।
थाना कोतवाली के मुहल्ला तीरगरान स्थित धार्मिक स्थल के पास कुंए का विवाद वर्षों पुराना है। कुएं को लेकर दो पक्ष कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। उनमें समझौते भी हुए। लेकिन हल नहीं निकल पाया। चार दिन पहले भी यहां विवाद हुआ था। इसकी जानकारी थाना पुलिस को भी थी। फिर शानिवार को जब यहां एक पक्ष के लोगों ने प्याउ बनाने का काम शुरू करना चाहा तो दूसरे पक्ष ने इसकी सूचना अधिकारियों को दी। लेकिन पुलिस अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे। थोड़ी प्रतीक्षा के बाद दूसरे पक्ष ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। कुछ देर के लिए लगा कि मामला शांत हो गया है। लेकिन थोड़ी देर बाद ही दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। जमकर पथराव व फायरिंग हुई। दर्जनों लोग घायल हो गए। चार को गोली लगी जिसमें से एक की हालत नाजुक बनी हुई है। बलवाईयों ने दुकानें लूटीं, वाहनों को आग के हवाले किया और थोड़ी संख्या में मौके पर पहुंची पुलिस लाचार देखती रही। बाद में आईजी आलोक शर्मा भारी पुलिस बल लेकर पहुंचे और फिर पुलिस अपने रंग में नजर आई।
शानिवार को प्याउ को लेकर हुए विवाद के बाद दोनो पक्ष वापस चले गए थे। इस घटना के कुछ देर बाद दोनों पक्ष आमने-सामने आए और पथराव व फायरिंग हुई। इससे ऐसा आभास मिलता है कि उन्हें किसी के द्वारा उकसाया या भड़काया गया था। पुलिस के सूत्र इसके पीछे किसी सुनियोजित साजिश की संभावना से भी इनकार नहीं कर रहे हैं। घटना के बाद जिस तरह बड़ी संख्या में दोनों पक्षों की ओर से फायरिंग की गई है, उससे भी आखिर यह सवाल खड़ा हो रहा है कि इतनी बड़ संख्या में अवैध हथियार लोगों के पास कहां से आए। हाल ही में क्षेत्र में चुनाव हुए हैं। ऐसे में क्या पुलिस को इन हथियारों की कोई जानकारी नहीं थी। खुफिया विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।