मुजफ्फरनगर में हुए
सांप्रदायिक दंगों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से अखिलेश सरकार को लापरवाही के
लिए जिम्मेदार ठहराए जाने के बाद अन्य विपक्षी पार्टियां एसपी पर हमलावर हो गई
हैं। सभी विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
से इस्तीफे की मांग करनी शुरू कर दी है। बीजेपी के तेवर ज्यादा तीखे हैं।
इस मामले में बीजेपी के तेवर सबसे तीखे है। बीजेपी के नेता भी अखिलेश सरकार से तत्काल त्यागपत्र देने की मांग कर रहे हैं। बीजेपी नेताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। दंगे के जिम्मेदार लोग अब बेनकाब हो गए हैं। कैराना लोकसभा सीट से बीजेपी के प्रत्याशी हुकुम सिंह और थाना भवन विधायक सुरेश राणा ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। हुकुम सिंह ने कहा कि दंगे के असली आरोपी तो मुलायम सिंह और राज्य की एसपी सरकार है। हमारे नेताओं को बिनावजह दंगों का आरोपी बनाकर जेल भेजा गया। जबकि हमारे विधायक सुरेश राणा और संगीत सोम पूरी तरहा से पाक साफ हैं।
इस मामले में बीजेपी के तेवर सबसे तीखे है। बीजेपी के नेता भी अखिलेश सरकार से तत्काल त्यागपत्र देने की मांग कर रहे हैं। बीजेपी नेताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। दंगे के जिम्मेदार लोग अब बेनकाब हो गए हैं। कैराना लोकसभा सीट से बीजेपी के प्रत्याशी हुकुम सिंह और थाना भवन विधायक सुरेश राणा ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। हुकुम सिंह ने कहा कि दंगे के असली आरोपी तो मुलायम सिंह और राज्य की एसपी सरकार है। हमारे नेताओं को बिनावजह दंगों का आरोपी बनाकर जेल भेजा गया। जबकि हमारे विधायक सुरेश राणा और संगीत सोम पूरी तरहा से पाक साफ हैं।
उन्होंने कहा कि यह
नैतिकता कि लड़ाई थी, जिसमे
हमने अपने लोगों का साथ दिया। विधायक सुरेश राणा ने कहा कि नैतिकता के आधार पर
राज्य सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए। क्योंकि दंगे की असली साजिश राज्य सरकार ने
रची थी। उनका कहना है कि राज्य सरकार ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए हमारे साथ-साथ
हजारों लोगों पर फर्जी मुकदमे कायम किए। यह दंगा पूर्व नियोजित था, इसमें राज्य सरकार के बड़े मंत्री का हाथ था।
मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद विरोधी पार्टियों को एक बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है। चुनाव के दौरान हाथ आए इस हथियार का विपक्ष पूरा फायदा उठाने पर जुट गया है। मुजफ्फरनगर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष तेगबहादुर सैनी का कहना है कि अब एसपी सरकार बेनकाब हो गई है। उनका कहना है कि दंगों के बाद से ही कांग्रेस कह रही थी कि मुजफ्फरनगर के दंगे एसपी और बीजेपी की देन है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद एसपी की भूमिका साफ हो गई है। ऐसे में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। वहीं राष्टीय लोकदल के जिलाध्यक्ष अजित राठी भी दंगों के लिए एसपी और बीजेपी को दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि दोनों की मिलीभगत के कारण ही यहां दंगा हुआ था। राठी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद एसपी सरकार को सत्ता में रहने का कोई नैतिक अधिकार नही है।
मलकपुर राहत शिविर में रह रहे शरणार्थी सोकीन, इकबाल और समीना ने भी कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि अगर सरकार चाहती तो दंगे रुक सकते थे। राज्य सरकार पूरी तरह कसूरवार है। सरकार के साथ-साथ आला अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। गौरतलब है कि मुजफ्फरनगर में कवाल कांड के बाद वहां का माहौल गरमाने लगा था। उसके बाद खालापार की पंचायत व नंगला मंदौड़ में 31 अगस्त को हुई शोकसभा के बाद हालात और बिगड़ गए थे। 7 अगस्त की महापंचायत के बाद दंगा भड़क गया था। तभी से सभी सियासी दल दंगों की आग पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते आ रहे हैं।
मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद विरोधी पार्टियों को एक बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है। चुनाव के दौरान हाथ आए इस हथियार का विपक्ष पूरा फायदा उठाने पर जुट गया है। मुजफ्फरनगर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष तेगबहादुर सैनी का कहना है कि अब एसपी सरकार बेनकाब हो गई है। उनका कहना है कि दंगों के बाद से ही कांग्रेस कह रही थी कि मुजफ्फरनगर के दंगे एसपी और बीजेपी की देन है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद एसपी की भूमिका साफ हो गई है। ऐसे में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। वहीं राष्टीय लोकदल के जिलाध्यक्ष अजित राठी भी दंगों के लिए एसपी और बीजेपी को दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि दोनों की मिलीभगत के कारण ही यहां दंगा हुआ था। राठी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद एसपी सरकार को सत्ता में रहने का कोई नैतिक अधिकार नही है।
मलकपुर राहत शिविर में रह रहे शरणार्थी सोकीन, इकबाल और समीना ने भी कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि अगर सरकार चाहती तो दंगे रुक सकते थे। राज्य सरकार पूरी तरह कसूरवार है। सरकार के साथ-साथ आला अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। गौरतलब है कि मुजफ्फरनगर में कवाल कांड के बाद वहां का माहौल गरमाने लगा था। उसके बाद खालापार की पंचायत व नंगला मंदौड़ में 31 अगस्त को हुई शोकसभा के बाद हालात और बिगड़ गए थे। 7 अगस्त की महापंचायत के बाद दंगा भड़क गया था। तभी से सभी सियासी दल दंगों की आग पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते आ रहे हैं।
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