लोकसभा चुनाव में जाट
मतदाताओं पर सबकी नजरें लगी हैं। सभी दलों में जाट मतदाताओं को लेकर जबरदस्त होड़
मची है। कांग्रेस को जाट आरक्षण के साथ ही अजित सिंह के सहारे जाट मत मिलने की
उम्मीद है। उत्तर प्रदेश में प्रथम चरण में लोकसभा की मेरठ,
बागपत, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, अलीगढ़ समेत लोकसभा की जिन 10
सीटों पर चुनाव होना है, वहां जाट
मतदाता बडी संख्या में हैं।
आम चुनाव से ठीक पहले जाट समुदाय को अन्य पिछडा वर्ग की सूची में शामिल करने का केंद्र सरकार का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आने के बाद कांग्रेस-आरएलडी गठबंधन की चिंता बढ़ गई है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को 9 अप्रैल को अगली सुनवाई करनी है। ऐसे में चिंता इस बात को लेकर है कि अगर आरक्षण का मसला खारिज हो गया तो जाट मतों में बिखराव का खतरा बढ़ सकता है। 10 अप्रैल को मेरठ, बागपत, सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्घनगर, बुलंदशहर और अलीगढ़ की लोकसभा सीटों पर मतदान होना है। इन इलाकों में जाट मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।
पार्टियों की बात करें कांग्रेस ने आरक्षण का दांव खेला है। एसपी ने राजेन्द्र सिंह, कुलदीप उज्जवल, मुकेश चौधरी, राजपाल सिंह, ओमवीर तोमर समेत करीब आधा दर्जन नेताओं को लालबत्ती देकर जाटों को खुश करने की कोशिश की है। इनमें राजेन्द्र सिंह तो कैबिनेट मंत्री होने के साथ ही एसपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं। इसके अलावा गाजियाबाद से सुधन रावत को पार्टी उम्मीदवार बनाया है। एसपी महासचिव शिवपाल यादव ने दिसंबर में पीएम को पत्र लिख कर चरण सिंह को भारत रत्न की उपाधि देने की मांग करके जाटों को रिझाने की एक और कोशिश की। 18 दिसंबर को प्रदेश सरकार ने चरण सिंह के जन्म दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। वहीं, बीजेपी ने सत्यपाल सिंह को बागपत, पूर्व जनरल वीके सिंह को गाजियाबाद और संजीव बालियान को मुजफ्फरनगर सीट से टिकट देकर खुद को जाटों का हिमायती बताने की कोशिश की है। इनमें मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह और सेना प्रमुख रहे वीके सिंह हाल ही में राजनीति में उतरे हैं लेकिन बीजेपी ने अपने स्थानीय नेताओं के विरोध को दरकिनार करते हुए इन दोनो नेताओं को मैदान में उतारा है। इसके पीछे वजह शायद जाटों को खुश करने की ही रही है।
आम चुनाव से ठीक पहले जाट समुदाय को अन्य पिछडा वर्ग की सूची में शामिल करने का केंद्र सरकार का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आने के बाद कांग्रेस-आरएलडी गठबंधन की चिंता बढ़ गई है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को 9 अप्रैल को अगली सुनवाई करनी है। ऐसे में चिंता इस बात को लेकर है कि अगर आरक्षण का मसला खारिज हो गया तो जाट मतों में बिखराव का खतरा बढ़ सकता है। 10 अप्रैल को मेरठ, बागपत, सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्घनगर, बुलंदशहर और अलीगढ़ की लोकसभा सीटों पर मतदान होना है। इन इलाकों में जाट मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।
पार्टियों की बात करें कांग्रेस ने आरक्षण का दांव खेला है। एसपी ने राजेन्द्र सिंह, कुलदीप उज्जवल, मुकेश चौधरी, राजपाल सिंह, ओमवीर तोमर समेत करीब आधा दर्जन नेताओं को लालबत्ती देकर जाटों को खुश करने की कोशिश की है। इनमें राजेन्द्र सिंह तो कैबिनेट मंत्री होने के साथ ही एसपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं। इसके अलावा गाजियाबाद से सुधन रावत को पार्टी उम्मीदवार बनाया है। एसपी महासचिव शिवपाल यादव ने दिसंबर में पीएम को पत्र लिख कर चरण सिंह को भारत रत्न की उपाधि देने की मांग करके जाटों को रिझाने की एक और कोशिश की। 18 दिसंबर को प्रदेश सरकार ने चरण सिंह के जन्म दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। वहीं, बीजेपी ने सत्यपाल सिंह को बागपत, पूर्व जनरल वीके सिंह को गाजियाबाद और संजीव बालियान को मुजफ्फरनगर सीट से टिकट देकर खुद को जाटों का हिमायती बताने की कोशिश की है। इनमें मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह और सेना प्रमुख रहे वीके सिंह हाल ही में राजनीति में उतरे हैं लेकिन बीजेपी ने अपने स्थानीय नेताओं के विरोध को दरकिनार करते हुए इन दोनो नेताओं को मैदान में उतारा है। इसके पीछे वजह शायद जाटों को खुश करने की ही रही है।
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