4 हजार
साल पुरानी हड़प्पा सभ्यता के पूर्व क्षेत्र की सीमा रेखा पर बसे आलमगीरपुर गांव पर
संकट के बादल मंडरा रहे हैं। देश के 1400 हड़प्पाकालीन
स्थलों में आलमगीरपुर का विशेष महत्व है। इस अनमोल ऐतिहासिक धरोहर को एएसआई ने
सुरक्षित स्थल घोषित तो कर दिया, लेकिन
इसके संरक्षण के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है। जिसकी वजह से गांववाले अपने
खेतों के क्षेत्रफल को बढ़ाने के लिए टीले को काट कर तेजी से समतल जमीन में तब्दील
कर रहे हैं। टीले पर गोबर के बिटौरे बना लिए गए हैं। अवैध निर्माण हो रहे हैं।
एएसआई के अधिकारी संशाधनों की कमी का रोना रोकर इस समस्या से आंखें मूंदे हुए हैं।
देश की राजधानी दिल्ली
से महज 70 किमी की दूरी पर हिंडन नदी के
किनारे आलमगीरपुर गांव बसा हुआ है। मोदीनगर स्थित एमएम कॉलेज के इतिहास विभाग के
असोसिएट प्रोफेसर डॉ. केके शर्मा के अनुसार 2500 से
1700 बीसी के दौरान हड़प्पा सभ्यता
अफगानिस्तान से गांव आलमगीर तक फैली थी। वह बताते हैं कि इतिहासकारों का मानना है
कि आलमगीर हड़प्पा सभ्यता के पूर्व क्षेत्र का सबसे अंतिम गांव था। प्राचीन काल में
हिंडन को हर नदी के नाम से जाना जाता था। उस समय लोग नदी के किनारे ही बसा करते थे।
स्कूल की इतिहास की किताबों में भी आलमगीरपुर का जिक्र आता है।
डॉ. शर्मा के अनुसार आलमगीरपुर में सबसे पहले खुदाई का काम 1958 में एएसआई के अधिकारी वाईडी शर्मा के नेतृत्व में हुआ था। खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तन मिले थे, जिन पर सिंधु लिपी में लिखा हुआ था। इसके अलावा उस समय के मनके और खिलौने भी मिले थे, जिनसे यह पता चला था कि यह स्थल हड़प्पासभ्यता से जुड़ा हुआ है। इसके बाद चार साल पहले बीएचयू से इतिहास विभाग के कुछ लोग यहां आए थे और उन्होंने कुछ समय के लिए काम भी किया था।
आलमगीरपुर के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए एएसआई ने इसे सुरक्षित जोन घोषित किया था। लेकिन, सुरक्षा के लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं की गई है। जानकारी के नाम पर साईट के पास एएसआई का एक बोर्ड भर लगा है। जिस पर लिखा है कि टीले के 200 मीटर के दायरे में निर्माण कार्य करना अवैध है। गांव के लोग इसके ऐतिहासिक महत्व से अंजान हैं। वे अपनी खेती की जमीन को बढ़ाने के लिए टीले को काटकर समतल करते जा रहे हैं। गांव के एक बुर्जग के अनुसार जब पहले इस टीले की खुदाई हुई थी, तब यह बहुत बड़ा था। अब इसका क्षेत्रफल घटकर आधा रह गया है। इस संबंध में एएसआई के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने संशाधनों की कमी का हवाला दिया। उनका कहना है कि संशाधनों के अभाव में वे यहां गार्ड नियुक्त नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन, जब भी निर्माण या टीले के कटान की सूचना मिलती है, तो वे जाकर उस पर रोक लगाते हैं।
डॉ. शर्मा के अनुसार आलमगीरपुर में सबसे पहले खुदाई का काम 1958 में एएसआई के अधिकारी वाईडी शर्मा के नेतृत्व में हुआ था। खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तन मिले थे, जिन पर सिंधु लिपी में लिखा हुआ था। इसके अलावा उस समय के मनके और खिलौने भी मिले थे, जिनसे यह पता चला था कि यह स्थल हड़प्पासभ्यता से जुड़ा हुआ है। इसके बाद चार साल पहले बीएचयू से इतिहास विभाग के कुछ लोग यहां आए थे और उन्होंने कुछ समय के लिए काम भी किया था।
आलमगीरपुर के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए एएसआई ने इसे सुरक्षित जोन घोषित किया था। लेकिन, सुरक्षा के लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं की गई है। जानकारी के नाम पर साईट के पास एएसआई का एक बोर्ड भर लगा है। जिस पर लिखा है कि टीले के 200 मीटर के दायरे में निर्माण कार्य करना अवैध है। गांव के लोग इसके ऐतिहासिक महत्व से अंजान हैं। वे अपनी खेती की जमीन को बढ़ाने के लिए टीले को काटकर समतल करते जा रहे हैं। गांव के एक बुर्जग के अनुसार जब पहले इस टीले की खुदाई हुई थी, तब यह बहुत बड़ा था। अब इसका क्षेत्रफल घटकर आधा रह गया है। इस संबंध में एएसआई के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने संशाधनों की कमी का हवाला दिया। उनका कहना है कि संशाधनों के अभाव में वे यहां गार्ड नियुक्त नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन, जब भी निर्माण या टीले के कटान की सूचना मिलती है, तो वे जाकर उस पर रोक लगाते हैं।
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