Wednesday, March 31, 2010

रावण विवाह मंदिर बनाने के लिए गंग नहर के किनारे नंगला आडर गांव में भूमि पूजन

असुर राज रावण की जिंदगी के सकारात्मक और उजले पहलुओं को उजागर करने का बीड़ा कौशिकेश्वर ज्योतिर्लिंग रावण मंदिर अनुसंधान समिति ने उठाया है। समिति ने रावण विवाह मंदिर बनाने के लिए सरधना में गंग नहर के किनारे नंगला आडर गांव में भूमि पूजन किया है। मंदिर पर 6 करोड़ की लागत आने का अनुमान है। रावण का नाम सुनते ही उसके साथ जुड़ा रामायण का नकारात्मक प्रसंग उभरकर सामने आ जाता है। हालांकि समर्थकों का मानना है कि रावण की अच्छाइयों को समाज के सामने लाया ही नहीं गया। गाजियाबाद के कौशिकेश्वर ज्योतिर्लिंग रावण मंदिर और अनुसंधान समिति के अध्यक्ष अनिल कौशिक कहते हैं कि रावण प्रकांड पंडित और महान शिव भक्त था। वह अलौकिक शक्तियों का स्वामी भी था। कुछ का मानना है कि उसकी मौत के समय खुद भगवान राम ने उसे गुरु मानकर लक्ष्मण को उससे शिक्षा लेने के लिए भेजा था। कौशिक का कहना है कि रावण की जिंदगी के सकारात्मक पहलुओं को समाज के सामने लाने के लिए हमने रावण की ससुराल मेरठ को चुना है। मय नामक दानव के नाम पर पहले इस जगह का नाम मयराष्ट्र था। मय की पुत्री मंदोदरी से रावण का विवाह हुआ था। मेरठ जिले की सरधना तहसील में भव्य रावण मंदिर का निर्माण करने के लिए भूमि पूजन किया जा चुका है। मंदिर में नर्मदेश्वर के ज्योतिर्लिंग के साथ रावण की 10 सिर वाली प्रतिमा, मंदोदरी और भगवान शिव की मूर्ति स्थापित की जाएगी। कौशिक ने बताया कि रावण की दस सिरों वाली प्रतिमा दशानन गांव में पहुंच चुकी है। मंदिर के निर्माण के लिए गांव के ही एक व्यक्ति ने दो बीघे जमीन दान की है। मंदिर में स्थापित होने वाली शिव की प्रतिमा 44 फुट ऊंची होगी, जबकि रावण व मंदोदरी की प्रतिमाएं 5-5 फुट की होंगी। इस मंदिर का नाम रावण विवाह मंदिर होगा। मंदिर की दीवारों पर रावण द्वारा लड़े गए युद्धों का चित्रण होगा। मंदिर में 10 जून को ज्येष्ठ दशहरा पर शिवलिंग और रावण की मूर्ति की स्थापन पूरे विधि विधान से की जाएगी। मंदिर निर्माण पर लगभग 6 करोड़ का खर्च आएगा। कौशिक ने बताया कि रावण का दूसरा मंदिर उसके जन्मस्थल गौतमबुद्ध नगर के गांव बिसरख मे बनाया जाएगा। यह मंदिर रावण जन्म मंदिर के नाम से जाना जाएगा। तीसरा मंदिर झारखंड स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में बनाने की योजना है। यहां कैला पर्वत से लाए गए शिवलिंग को देवताओं ने रावण से छल कर स्थापित किया था। कौशिक का कहना है कि वे दशहरे पर रावण दहन के भी विरोधी है। दरअसल रावण का दाह संस्कार हुआ ही नहीं था। ऐसे में एक ब्राह्मण का हर साल दाह संस्कार शास्त्र सम्मत नहीं है।

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