देश की आजादी में हापुड़ के सैकड़ों शहीदों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यहां की गलियों-गलियों में उनकी जांबाजी के किस्से आज भी सुने जा सकते हैं। यहां के लोग बताते हैं कि हापुड़ में ऐसी कई जगहें हैं जहां क्रांतिकारियों ने सभाएं की थीं। तहसील मैदान में होने वाली सभा को महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी संबोधित किया था। हापुड़ के शहीदों में चौ. जबदत्त खां, चौ. रघुबीर नारायण सिंह, बाबू लक्ष्मी नारायण, सरयू प्रसाद, लाला मुकुट लाला संपादक, जगदीश प्रसाद तापडि़या, महाशय प्यारेलाल, कैलाश चंद्र मित्तल का नाम बड़ी शिद्दत से लिया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और 1920 में हापुड़ कांग्रेस कमिटी के संस्थापक स्व. लाला मुकुट लाल संपादक के पोते सुरेश संपादक ने बताया कि देश की आजादी में हापुड़ के शहीदों की शहादत को भुलाया नहीं जा सकता।
क्रांतिकारियों का प्रमुख अड्डा
मेरठ के कालीपलटन के मंदिर से 10 मई 1857 को अंगेजों के खिलाफ आवाज उठाई गई। इसमें हापुड़ और आसपास के सैकड़ों गांवों के लाल शामिल थे। हापुड़ तहसील क्रांतिकारियों का प्रमुख अड्डा थी। यहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी समेत कई नेता सभाएं करते थे। हालांकि, अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाने और खुलकर लोहा लेने की हापुड़वालों ने कीमत भी चुकाई। हापुड़ तहसील के 26 गांवों के गुर्जरों और अन्य लोगों को बड़ी बेरहमी से पैरों में कील गाढ़कर जिंदा जला दिया गया और कुछ को पेड़ों से बांधकर गोली से उड़वा दिया। ये पेड़ आज भी शहीदों की शहादत की याद दिलाते हैं।
जेल भी गए आजादी के परवाने
3 अगस्त 1942 को जब मुंबई में ऑल इंडिया कांग्रेस वर्किन्ग कमिटी की बैठक में 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित किया गया, तब 9 अगस्त 1942 को हापुड़ में जुलूस निकालने की योजना बनाई गई। इस योजना की भनक अंग्रेजों को लग गई और उन्होंने हापुड़ के कद्दावर नेता बाबू लक्ष्मी नारायण, लाला बख्तावर लाल और बाबू सरजू प्रसाद को मेरठ जेल में डाल दिया। इसके विरोध में हापुड़ में अगले दिन बाजार बंद कर हड़ताल की गई। जुलूस निकालने पर अंग्रेजी हुकूमत ने लाला परमानंद, अमोलक चंद्र, रतन लाल गर्ग, बाबू मुरारी लाल और खलीफा मंजूर हसन को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें बड़ी यातनाएं दीं।
' मिनी जलियांवाला बाग' ने झकझोरा
आजादी की लड़ाई के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कहने पर देशभक्त अंग्रेजों के विरुद्ध जुलूस निकालने और तिरंगा फहराने आजाद पार्क टाउन हॉल के निकट जुलूस के रूप में पहुंचे। वहां मौजूद अंग्रेजों के डिप्टी कलेक्टर गय्यूब अहमद जलील ने भारी पुलिस बल की मदद से निहत्थे आंदोलनकारियों को चारों तरफ से घेर लिया। उन्होंने बिना चेतावनी दिए देशभक्तों पर लाठी-डंडे चलवाए और 14 राउंड गोलियां चलवाईं। इसमें कई लोगों की जानें गई और सैकड़ों घायल हुए। घायल होने के बावजूद लाला सेवाराम ने तिरंगे को झुकने नहीं दिया। इससे खफा होकर अंग्रेजों ने उनकी जीभ कटवा दी और बाकी लोगों पर भी कहर बरपाया। इस कांड को 'मिनी जलियांवाला बाग' का नाम दिया गया। बाद में इस घटनास्थल को शहीद स्मारक घोषित कर दिया गया।
शहीद स्मारक पर कब्जा
अब पुलिस वाले और दुकानदारों ने इस जगह पर कब्जा कर रखा है। सुरेश संपादक ने बताया कि हाई कोर्ट ने शहीद स्मारक स्थल पर स्थित पुलिस चौकी को खाली करने के आदेश दिए थे, लेकिन पुलिस वालों ने ऐसा नहीं किया। कमिटी भी यह जगह खाली करवाने में असफल रही है।
Sunday, August 16, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment