मेरठ से मात्र 10 किलोमीटर
दूर 1952 में बसी मेरठ के रेड़ा बस्ती में
आजादी के इतने सालों बाद भी बिजली नहीं पहुंची है। बदलते समय ने इस बस्ती को नया
नाम और ओहदा दिया, लेकिन
नहीं मिली तो बिजली सप्लाई। गांव के बुजुर्ग किरनचंद कश्यप का कहना है कि गांव से 3 किलोमीटर दूर कांशी गांव के
रेजिडेंट्स 1952
में यहां आकर बस गए थे।
उस समय वे पुआल की झोपड़ियों और कच्चे मकानों में रहने लगे। 1980 के शुरुआत में उनके मकान पक्के हो
गए।
हालांकि मेरठ नगर निगम ने इसे अवैध
शहरी बस्ती करार दिया। मामला कोर्ट पहुंचा। 1987 में
गांव वालों की जीत हुई। इस गांव को कश्यप कॉलोनी नाम मिला और नगर पालिका के तहत
इसे शहरी गांव घोषित कर दिया गया। इतना कुछ होने के बाद भी इस गांव में अब तक
बिजली नहीं पहुंची है। कश्यप ने बताया कि यहां रहने वाली कई पीढ़ियां बिना पंखा
देखे ही मर गईं।
एनजीओ मेरठ नागरिक अधिकार मंच
(एमएनएएम) ने इस गांव में फिल्ड रिसर्च कर डेटा जुटाए। संस्था के संयोजक पंकज
शर्मा ने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों में हमने इस गांव का कई बार दौरा किया। यहां 2000 रेजिडेंट्स रहते हैं। इनमें से
ज्यादातर अशिक्षित हैं, इसकी
एक प्रमुख वजह बिजली का नहीं होना भी है। गांव के बच्चे सूरज डूबने से पहले अपनी
पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। एग्जाम के समय वे मोमबत्ती की धुंधली रोशनी में पढ़ने के
लिए मजबूर हैं।
शर्मा ने बताया कि ज्यादातर गांव
वाले राजमस्त्री और किसान हैं। गांव में एक ट्यूबवैल है, लेकिन इसे चलाने के लिए बिजली नहीं
है। गांव वाले कैरासिन वाले जनरेटर का इस्तेमाल इस ट्यूबवैल से पानी निकालने के
लिए करते हैं। वॉटर सप्लाई यहां की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने बताया कि
यहां 5 हैंडपंप है जिनमें से 2 ही काम करते हैं।
नगर निगम के अधिकारी इस बारे में
कुछ बताने के लिए उपलब्ध नहीं थे। हालांकि पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड
के सुप्रिंटेंडिंग इंजीनियर पीके निगम ने बताया कि कश्यप कॉलोनी के लोगों की
समस्याओं से मैं वाकिफ हूं। पिछले महीने इस मसले पर मेरठ के सांसद राजेंद्र
अग्रवाल, डीएम पंकज यादव और निगम के
अधिकारियों के साथ मीटिंग हुई थी। कश्यप कॉलोनी शहरी क्षेत्र के लिए चलाए जा रहे
इंटीग्रेटेड पावर डिवेलपमेंट स्कीम का पार्ट है। उससे इस बारे में पूछा गया है कि
इस गांव को बिजली कब मिलेगी। उन्होंने कहा कि हालांकि यह स्कीम अभी शुरू नही हुई
है, लेकिन जल्द ही यह शुरू हो जाएगी।
एक लंबे अनुभव के बाद यहां के
रेजिडेंट्स बिना बिजली के रहने के आदि हो चुके हैं। जब हम आजादी के तुरंत बाद यहां
सेटल हुए तो हम इस उम्मीद के साथ आए थे कि हम अपनी आने वाली जनरेशन को अपने से
बेहतरीन लाइफ दे सकेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। गांव को जोड़ने वाली पक्की सड़क
भी नहीं है। यहां का सबसे नजदीकी अस्पताल पीएल शर्मा जिला अस्पताल है जो यहां से 20 किलोमीटर दूर है। यहां रहने वाले 70 साल के खालिद अहमद का कहना है कि
मरने से पहले मैं यहां बिजली के पोल को खड़े देखना चाहता हूं।
No comments:
Post a Comment