यूपी के मुख्ममंत्री अखिलेश यादव की मेरठ के गांव चांदोरा में जूनियर
हाई स्कूल बनाने की घोषणा की थी। लेकिन 17 साल
की जैनाब खान जैसी लड़कियों का जूनियर हाई स्कूल का सपना शायद सपना ही रह जाएगा।
जैनाब ने न केवल अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की, बल्कि
12 लड़कियों को भी 8वीं तक की पढ़ाई पूरी करने में मदद
की। गांव में अभी तक 8वीं
तक ही स्कूल है। गांव में सेकेंडरी स्कूल बनाने के लिए 3,500 वर्ग गज जमीन की जरूरत है, लेकिन गांव के प्रधान का कहना है
कि उन्हें केवल 2,500
वर्ग गज जमीन ही दी गई
है। जिला प्रशासन का कहना है कि जितनी जमीन दी गई है वह स्कूल बनाने के लिए
पर्याप्त नहीं है।
चांदोरा गांव के प्रधान समास-उल-हक
ने बताया कि आदेश के अनुसार हमें स्कूल बनाने की अनुमति मिलने के लिए 3,500 वर्ग गज जमीन की जरूरत है, जबकि कागजों में 2,500 वर्ग गज जमीन ही स्कूल के निर्माण
के लिए मिला है। जमीन की कमी की वजह से गांव में जूनियर हाई स्कूल के निर्माण के
प्रस्ताव को झटका लग सकता है। चांदोरा गांव मेरठ से 80 किलोमीटर दूर है। यहां रहने वाले
ज्यादातर लोग मजदूर हैं। इन परिवारों की लड़कियां फुटबाल की सिलाई का काम करती
हैं। गांव में जो स्कूल है वह 8वीं
तक ही है। 8वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद
आसपास कोई जूनियर हाई स्कूल नहीं होने की वजह से यहां की लड़कियों को पढ़ाई छोड़नी
पड़ती है।
डीआईओएस एके मिश्रा ने बताया कि 20 मई को यूपी सरकार के सेक्रेटरी
बी.बी सिंह की ओर से जारी पत्र के अनुसार सीएम अखिलेश यादव ने चांदोरा गांव में
हायर सेकेंडरी स्कूल खोलने की घोषणा की है। इसके बाद ग्राम प्रधान को कहा गया है
कि वह स्कूल बनाने के लिए जमीन निर्धारित करें। चांदोरा गांव की आबादी 14,000 के करीब है। जेनाब खान और उनकी
सहेलियों को छोड़ दें तो शायद ही किसी लड़की ने 8वीं तक की पढ़ाई की हो। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के जिला
समन्वयक जफर खान का कहना है कि यह सच है कि स्कूल बनाने के लिए 1000 वर्ग गज जमीन कम पड़ रही है। इसलिए
हम स्कूल निर्माण की अनुमति नहीं दे सकते। हमें सरकार से आदेश मिला है कि स्कूल
निर्माण पर होने वाले खर्च का व्यौरा भेजें। जिसे हमने पहले ही भेज दिया है। हमने
बेसिक शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखा है कि जितनी जमीन है उतने में ही जूनियर हाई
स्कूल बनाने की इजाजत दी जाए। जब हमें अनुमति मिल जाएगी तब हम जूनियर हाई स्कूल के
निर्माण की तैयारी कर सकते हैं।
कौन है जैनाब
जेनाब ने बताया कि मैं फुटबॉल की
सिलाई कर अपने परिवार की मदद करती थी। एक फुटबॉल की सिलाई के 5 रुपये मिलते थे। रोज 4 फुटबॉल सिलती थी, जिससे 20 रुपये मिल जाते थे। लेकिन 2005 में गांव का बाल प्रधान बनने के
बाद सब कुछ बदल गया। न केवल मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि गांववालों को लड़कियों को
पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। यूपी के सीएम के इस मामले में हस्तक्षेप के बाद
मुझे लगा था कि मेरा सपना पूरा हो जाएगा। लेकिन हमारे सामने नई समस्या खड़ी हो गई
है।
No comments:
Post a Comment