Wednesday, August 19, 2015

उत्तर प्रदेश में 2014 में 63 किसानों ने आत्महत्या की

हाल ही में जारी नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2014 में 63 किसानों ने आत्महत्या की थी। वहीं, किसानों के एक ग्रुप का दावा है कि इस साल कुछ जिलों में ही आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या पिछले साल पूरे राज्य में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या को पार कर गया है। भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के जिला अध्यक्ष विनोद जटोली का कहना है कि हमारे कार्यकर्ता लगातार उन किसानों के परिजनों के संपर्क में हैं, जिन्होंने इस साल आत्महत्या की। हम उन किसानों का भी पता लगा रहे हैं जिन्होंने इस साल आत्महत्या की। यह डेटा हमारे कार्यकर्ताओं की ओर से कलेक्ट किया गया है।
विनोद का दावा है कि इस साल मेरठ में 20, हापुड़ में 14, गाजियाबाद में 10, बागपत में 3 और मुजफ्फरनगर में 2 किसानों ने आत्महत्या की। इन 5 जिलों को मिलाकर ही आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 49 है। वहीं, पिछले साल 75 जिले में 63 किसानों ने आत्महत्या की थी। अभी अगस्त का महीना चल रहा है, लेकिन यह डेटा बहुत ज्यादा है। अगर हम वेस्टर्न यूपी के कुछ और जिलों को जोड़ दें तो इस साल आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या पिछले साल पूरे प्रदेश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या को पार कर जाएगी। फाइनल स्टेट वाइज फिगर और डरावना है। विनोद का कहना है कि ये डेटा किसी भी सरकार को जगाने के लिए काफी हैं। एसडीएम (फाइनेंस) गौरव वर्मा इस मसले पर कमेंट करने के लिए मौजूद नहीं थे।
गौरतलब है कि मार्च 2015 में खबर छपी थी कि एक महीने में ही मेरठ, आगरा और अलीगढ़ में लगभग 25 किसानों ने आत्महत्या की। हालांकि इसमें उन किसानों के आंकड़े भी शामिल हैं जिनकी मौत हार्ट अटैक से हुई। इन मौतों में ज्यादातर संख्या आत्महत्या करने वाले किसानों की है। अकेले मेरठ में ही मार्च महीने में 5 किसानों ने आत्महत्या की। इन मौतों का सबसे बड़ा कारण मार्च में बिन सीजन बरसात थी। मौसम विभाग का दावा है कि 2015 का मार्च इस सदी का सबसे आर्द्र (नम) महीना रहा।
बहरहाल उत्तर प्रदेश और बिहार क्षेत्रफल व जनसंख्या के मामले में 2 बड़े राज्य हैं। यहां आत्महत्या करने वाले किसानों की दर 10000 पर एक है, जो महाराष्ट्र, केरल और पुडुचेरी से दस गुना कम है। वहीं नैशनल औसत 1.36 की तुलना में यूपी में आत्महत्या करने वाले किसानों की औसत 0.36 है जो कि बहुत कम है, फिर भी ये आंकड़े चिंताजनक हैं।
भारतीय किसान आंदोलन (बीकेए) के अध्यक्ष कुलदीप त्यागी का कहना है कि किसान हाशिए पर हैं। मार्च में हुई बारिश ने कई किसानों की जिंदगी छीन ली। किसानों की फसल बर्बाद होने से कई किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया। जो किसान इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए उन्होंने अपनी लाइफ खत्म कर ली। त्यागी का कहना है कि किसानों की आत्महत्या करने की दूसरी वजह यह है कि इस साल राज्य की शुगर मिलों ने गन्ना खरीदने से मना कर दिया। इसका मतलब यह है कि लगभग 40 लाख किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए कोई जगह नहीं मिली। सरकार को इस आपदा से सीख लेनी चाहिए और फ्यूचर में इस तरह की आपदा आने पर इससे बचने के उपाय अभी से करने चाहिए।

No comments:

Post a Comment