विश्वविद्यालय के सभागार में सोमवार को प्रतिभा आडवाणी की लघु फिल्म ने
देशभक्ति की धारा प्रवाहित कर दी। पर्दे पर जैसे ही दृश्य उभरे, पूरा
हाल तालियों से गूंज गया। फिल्मी गानों की पैरोडी पर तिरंगा बनने की कहानी व्यक्त
होती रही। ऋग्वेद और महाभारत काल से बहने वाली ध्वजों की धारा में देश का इतिहास
भी उभरा। प्रतिभा ने इसमें फिल्मी देशभक्ति गानों की कड़ियां सजाकर तिरंगा की यात्रा
को अत्यंत रोचक बना दिया। भागदौड़ और करियर की उलझनों में फंसी नई पीढ़ी ने तिरंगा
की यात्रा का हर पल अपने दिल से लगाया।
फिल्म में प्रतिभा ने सबसे पहले तिरंगे के जन्म की कहानी बताई। 22 जुलाई
1947 को राष्ट्रीय ध्वज अस्तित्व में आया, और अब इसे बनाने का अधिकार कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग को मिला है। फिल्म
में ध्वजों की पूरी परंपरा पर विस्तार से फोकस किया गया। रामायण काल में रावण और
महाभारत में अर्जुन के ध्वजों की जानकारी पर छात्रों ने जमकर ताली बजाई। 10
मई को मेरठ में भारतीय सैनिकों की बगावत और रातभर में दिल्ली
पहुंचकर लालकिला पर कब्जा करने का जिक्र आते ही छात्रों में गर्वभाव जाग गया।
उन्होंने देर तक तालियां बजाकर पटकथा की तारीफ की। फिल्म के जरिए बताया गया कि
वर्ष 1904 में निवेदिता नामक एक महिला ने ध्वज बनाया था,
जिसमें पर्दे पर 101 जलते हुए दीये छापे गए
थे। बीच में वज्र का निशान था। बंगाल विभाजन के बाद विरोध का दमन तेज कर दिया गया।
इसमें सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी के नेतृत्व में एक झंडे के नीचे लड़ाई लड़ी गई। राजाराम
मोहन राय ने पहला तिरंगा लहराया, जिसमें बीच में वंदेमातरम्
लिखा था। इन दृश्यों के बीच प्रतिभा आडवाणी की प्रस्तुति एवं देशभक्ति गानों को
दर्शकों ने काफी पसंद किया। विजयवाड़ा के वेंकैया से महात्मा गांधी ने नया झंडा
बनाने के लिए कहा, जिसे 1931 में
कांग्रेस अधिवेशन में फहराया गया। इसमें बीच में चरखा बना था, जो लोगों के परिश्रम का प्रतीक माना गया। इसी ध्वज के नीचे भारत छोड़ो
आंदोलन ने ताकत पकड़ी। 26 जुलाई 1930 को
जवाहरलाल नेहरू ने इसी ध्वज के नीचे पूर्ण स्वराज की मांग उठाई। किंतु कुछ वर्गो
से ध्वज को लेकर आपत्तियां आने लगीं। वर्ष 1931 में झंडा
कमेटी बनाई गई। फिर से झंडा बनाने का जिम्मा सौंपा गया। बाद में सफेद रंग का समावेश
किया गया। आठ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने इसमें चरखा जोड़
दिया। नौ अगस्त को तमाम क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए। जबकि मुंबई में आसिफ अली
ने इस झंडे को फहराकर स्वाधीनता संग्राम को नई ताकत दे दी। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा की बैठक में अशोक चक्र को
सहमति दी और आजादी मिलते ही 16 अगस्त को यही तिरंगा लालकिला
एवं इंडिया गेट पर फहराया गया। पूरी फिल्म मोहम्मद रफी, लता
मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मन्ना-डे,
सोनू निगम एवं अन्य तमाम गायकों के स्वरों से सजी रही।